Vande Mataram लोकसभा के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर पहली बार औपचारिक बहस हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा की शुरुआत करते हुए इसे “ऐतिहासिक क्षण” बताया। उन्होंने राष्ट्रगीत की भूमिका, स्वतंत्रता संग्राम में इसके योगदान और राष्ट्रीय एकता पर इसके प्रभाव का उल्लेख किया। बहस के दौरान विपक्ष के नेता गौरव गोगोई, अखिलेश यादव और अनुराग ठाकुर ने भी अपने विचार रखे।
प्रियंका गांधी: “पीएम का भाषण अच्छा, पर तथ्य कमजोर”

Vande Mataram प्रियंका गांधी ने पीएम मोदी के भाषण की शैली की सराहना की, लेकिन तथ्यों की कमी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् का घटनाक्रम सही नहीं बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने पहले दो पद लिखे थे और 1882 में आनंदमठ में चार और पद जोड़े गए। उनके अनुसार, तथ्यात्मक गलतियों को ठीक करना जनता के प्रति जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, गरीबी और प्रदूषण—को उठाने के बजाय भावनात्मक विषयों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है।
वंदे मातरम् : भारत का राष्ट्रीय गीत:
Vande Mataramभारत का राष्ट्रगीत है, जिसे बंकिमचंद्र चटर्जी ने संस्कृत और बंगला मिश्रित भाषा में रचा था। यह गीत पहली बार 1882 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में सम्मिलित किया गया। मातृभूमि की वंदना करते हुए यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख प्रेरणास्रोत बना। 2025 में इसकी रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर लोकसभा में एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें इसकी ऐतिहासिक भूमिका और सांस्कृतिक महत्व को सम्मान दिया गया।
गीत की रचना और भाषाई संरचना:
Vande Mataramशुरुआत के दो पदों में संस्कृत में रचा गया है, जबकि आगे के पद बंगला भाषा में हैं। बंकिमचंद्र ने इसे बंगला लिपि में “बन्दे मातरम्” शीर्षक से लिखा था, क्योंकि बंगला में ‘व’ अक्षर नहीं होता। देवनागरी में “वन्दे मातरम्” शुद्ध माना जाता है क्योंकि इसका अर्थ “माता को वंदना करता हूँ” निकलता है। इस गीत की धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की। इसे गाने में लगभग 65 सेकंड लगते हैं।
गीत की लोकप्रियता और विश्व पहचान
Vande Mataram 2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण में वंदे मातरम् दुनिया के शीर्ष 10 गीतों में दूसरे स्थान पर चुना गया। इस सर्वे में 155 देशों के लाखों लोगों ने भाग लिया। यह इस गीत की विश्वस्तरीय लोकप्रियता का प्रमाण है। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत एक नारा, एक शक्ति और एक भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया।
आनंद मठ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
Vande Mataram 1870–80 के दशक में ब्रिटिश सरकार ने ‘गॉड सेव द क्वीन’ को सरकारी समारोहों में गाने का आदेश दिया था। इससे प्रेरित होकर बंकिमचंद्र ने मातृभूमि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए एक नया गीत लिखा—वंदे मातरम्। आनंद मठ उपन्यास में यह गीत संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में आता है, जो अंग्रेजी शासन, जमींदारों की अत्याचार और अकाल से त्रस्त जनता को जगाने का प्रतीक था। यह गीत पहली बार 1875 में पूरा हुआ और कहा जाता है कि यह उन्होंने ट्रेन में यात्रा करते हुए लिखा।
स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका:
Vande Mataram भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्राण–गीत बन गया। 1886 में कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार यह गीत गाया गया। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सुर में प्रस्तुत किया। 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में लाखों लोगों ने इसे एक साथ गाया। मैडम भीकाजी कामा द्वारा 1907 में फहराए गए भारतीय ध्वज पर भी “वंदे मातरम्” अंकित था। अनेक क्रांतिकारी, जैसे– रामप्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपत राय और मातंगिनी हाजरा इस गीत से प्रेरित थे। इसके नारे से जनता में राष्ट्रभक्ति की लहर जाग उठती थी।
राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता:
Vande Mataram भारत की स्वतंत्रता के बाद यह प्रश्न उठा कि राष्ट्रगीत क्या होगा। कुछ मुसलमान संगठनों ने गीत के उन पदों पर आपत्ति जताई जिनमें देवी-देवताओं का उल्लेख है। 1937 में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद समेत कई नेताओं की समिति ने तय किया कि गीत के केवल प्रथम दो पद राष्ट्रगीत के रूप में मान्य होंगे क्योंकि इनमें केवल मातृभूमि की स्तुति है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करने की औपचारिक घोषणा की।
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